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Mann, Aatma aur Paramatma kya hai?

Updated: Aug 12, 2019

       अपने निज, अपने स्वयम् और अपने आपको, दार्शनिक भाषा में आत्मा कहते हैं। यह आत्मा, यह अपना आप चेतन प्राणियों वा जीवों में ही पाया जाता है। जो जड़ है उसके भीतर अपने आपको अनुभव करने वाली आत्मा ऐसी चीज नहीं है । अपनी आत्मा में ही, अपने आप में ही, अपनी भलाई की शक्ति है।


        मन, आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं है। आत्मा जब बृति स्वरुप होता है तब मन कहलाता हे। अम्मा का चंचलता का नाम मन ही है। उपनिषद में "मनोमयात्मा" कहा गया है । मन ही आत्मा हे। मन का या आत्मा का स्वरुप अवस्था ही परमात्मा है । यही आत्मा स्वाधाय, सत्संग, साधन और सद्गुरु के उपदेश से अपने स्वरुप को पूर्ण रूप से पहचान कर परमात्मा रूप धारण करता है । जैसे आदमी बड़ा आदमी बन जाता है, वैसे ही । परम का मतलब बड़ा है । अतः परमात्मा का अर्थ हुआ - बड़ा आत्मा । स्थूल शरीर धारी मनुष्य जब निरंतर सत्य का साधन करता है, अपने स्वरुप को जान लेता है, तब वो परमात्मा कहलाता है ।

शास्त्र में कहा गया है - " ब्रम्हवीत ब्रम्हैवभवति ।"


      शिबमुनि योगदर्शन में लिखे हैं -

"आत्मा चिन्मात्र ( चित् + मात्र ) हैं । चित् (चेतन ) मात्र होने से योगशास्त्र में आत्मा को ही चित्त कहा है । इस चेतन आत्मा की जो चेतनता है वह गति रूप और शक्ति रूप है । चेतन में स्वभाविक रूप से गति और स्फुरण होता है; इसी को वृत्ति कहते हैं । इसी वृत्ति को मन कहते हैं । जिसे मन कहते हैं उसी को इच्छा कहते हैं । मनोबल को लोग इच्छाशक्ति भी कहते हैं । अतः यदि मन और इच्छा दोनों एक हैं तो यह चित्त की वृत्ति भी इच्छा ही है। योग की सबसे बड़ी सिद्धि यही है कि योगी "वृत्तिसारुप्य" होता है -- सत्य संकल्प होता है -- योगी जैसा होने की इच्छा करता है वही हो जाता है; जो चाहता है वह पा जाता है, अथवा जैसी उसकी वृत्ति होती है वही और वैसा ही हो जाता है ।"


       आत्मा मनोमय है, जैसे फूल सुगन्धमय है, सूर्य किरणमय है। मैं या विचार आत्मा की गुण है, कार्य-कारनी शक्ति है। अगर किरण नहीं होता तो कौन ऊपर देखता, वैसे ही अगर मन नहीं होता तो कौन क्या सोच पाता ? फूल खिला बगीचे में, भ्रमर को पता चलता है सुगन्ध से। सुगन्ध भीतर से बाहर की और यात्रा करता है, जैसे हमारा मन। लेकिन भ्रमर को फूल की तरफ जाना है, लक्ष्य है फूल। लेकिन भ्रमर जाता है उस दिशा में जिस दिशा में सुगंध बिखरा है, जो उल्टा दिशा है, यह निबृति मार्ग है । मन से विचार सुरु होते है । जहाँ से विचार शुरू होते है, कम्पन शुरू होते है, वहां कुछ तो है । जिस दिन पता लग जाता है की मैं परम चैतन्य हूँ, उस दिन से पता लग जाता है की मैं परमात्मा हूँ । होने में देरी नहीं है, वह तो पहले से था, जान लेने के बाद भी वैसे है, लेकिन जान ने में देरी है। केबल स्वरुप ज्ञान लेने से आपनी विराट या परम अश्तित्व का पता चल सकता है। बिंदु जो दिखाई पड रहा था पहले, अभी पता चला की वो सिंधु है, विराट सागर है । चैतन्य ही चैतन्य है, परम चैतन्य यानि परमात्मा । ना मन है, ना बृति है, ना स्वप्न है ना जाग्रत संसार, ना ही सुसुप्ति ।

"सर्वं खल्विदंब्रह्म ।।"

In simple words - "when Jeevatma (soul / aatma) is transformed, it becomes Paramatma."

Mann, Aatma, Paramatma - All are equal. But they are one one stages, likewise water can stay in liquid, solid and vapour state. We have to cross these stages one by one. Yoga is a process for transformation of self(atma) from animal level to divine level . Just think about a caterpillar transforming itself to a butterfly. Nobody wants to touch a caterpillar, but everybody runs behind butterfly to see it's beauty and catch it. That's the power of transformation from a Jeevatma to Paramatma.


शास्त्रानुसार -

"उपद्रष्टानुमन्ता च भर्त्ता भोक्ता महेश्वरः ।

परमात्मेति चाप्युक्त्तो देहेस्मिन पुरुषः परो ।।"

अर्थ - उपद्रष्टा अनुमन्ता , भर्त्ता , भोक्त्ता , महेश्वर ओर परमात्मा जीब यानि आत्मा को ही कहा गया है । वह महेस्वर तथा महान पुरुष इसी देह में स्थित है


शिबमुनि लिखे हैं -

"आत्मोपकार की दृष्टि से ही परोपकार होता है। किसी भी तरह का अपना उपकार या उन्नति तब तक नहीं हो सकती जबतक हम स्वयम् नहीं चाहते। अच्छी से अच्छी सलाह, उपदेश और राय पड़ी रह जायगी, यदि हमारे पास उसे ग्रहण करने या उस अच्छी सलाह को समझने की शक्ति नहीं है। सच्चे गुरु, सच्चे उपदेशक और सच्चे योगी को यदि आप स्वयं नहीं पहचान सकेंगे तो आपका उपकार कैसे होगा? सच्चा गुरु यदि स्वयं आकर कहे कि हम सच्चे हैं, हमारे शिष्य हो जाओ तब तो आप और उससे दूर हो जायेंगे। सच्चा वाक्य, सच्चा वकील, सच्चा मैनेजर, सच्चा मित्र, सच्चा सेवक, सच्चा शिक्षक आपको तब तक नहीं मिल सकता जब तक कि आपको अपने आप में, निज में, सच्चे को जान लेने, पहचान लेने और चुन लेने की शक्ति नहीं है। अतः आपका उद्धार तब तक नहीं हो सकता जब तक आप स्वयम् अपने से अपना उद्धार करना नहीं चाहते ।"


। जयजीव ।

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